equal rights for persons with disabilities

विकलांगता के कारण सहकर्मी मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते

एक अनाम व्यक्ति ने अपनी समस्या बताई है कि ऑफ़िस में सहकर्मी विकलांगता के कारण उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करते। सम्यक ललित द्वारा समस्या का समाधान सुझाया गया है।

woman in wheelchair in front of inaccessible steps

क्या एक विकलांग दूसरे विकलांग की मजबूरी और संघर्ष को समझता है

सामान्य लोगों द्वारा ऐसा व्यवहार तो आम बात है परंतु विकलांग व्यक्तियों द्वारा इस तरह का व्यावहार क्या उचित है?

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ज़्यादा तकलीफ़ समाज में हीन दृष्टि से देखे जाने के कारण हो रही है

लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। ग्राम विकास अधिकारी के पद पर रहते हुए 8 माह के कार्यकाल के बाद विभाग द्वारा पुनः जाँच हुई जिसमें एक आँख को 6/24 और दूसरी को 6/18 बता कर मेरी विकलांगता 40% से घटाकर 10% कर दी गई और मुझे अपात्र घोषित करते हुए नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

image of a girl with angel like wings sitting on a wheelchair while tying her ballerina shoes.

हमारे बाद इसका क्या होगा?

किसी विकलांग बच्चे के माता-पिता के मुँह से अपने बच्चे के भविष्य की चिंता में यह सवाल करते, आपने ज़रूर सुना होगा। अधिकांश विकलांग बच्चों के माता-पिता को  पूरी ज़िन्दगी यही डर सताता रहता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके विकलांग बच्चे का क्या होगा…? वे अपनी पूरी ज़िन्दगी इसी सवाल से उपजे डर के साये में बिता देते हैं।

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यही पल ज़िंदगी

विकलांगता केवल उदासी, अकेलेपन, मजबूरी, और बेचारगी नहीं होती। उससे कहीं आगे की यात्रा होती है। विकलांगों को अजीब नजरों से देखना बंद कीजिए, उन्हें दोस्त की तरह अपना कर देखें।

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“Accessibility” व्यवहार में आए तो बात बने! “Acceptance” सोच में आए तो बात बने!

मेरी विकलांगता को लेकर मैंने कभी भी रैना को असहज होते नहीं देखा। उसने हमेशा मेरी विकलांगता और मेरे वास्तविक व्यक्तित्व को जानने-समझने का प्रयास किया। इसके लिए उसने अपने व्यवहार को मेरे लिए सुगम “Accessible” बनाया।

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नर्क

पिछले किसी जन्म में तुम भी इसके (विकलांग) किए गुनाहों में सहभागी थे इसलिए तुम भी सज़ा के बराबर हकदार हो। तुमने इसके किए गुनाह में ऐसे साथ दिया इसलिए तुम इसकी माँ बनी, तुम फलां तरीके से जुर्म में शामिल थे इसलिए तुम इसके पिता हो। इसकी सेवा तुम्हारे हिस्से आई है तुम्हारा जन्म सफल हुआ समझो।

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किसकी “क्षमता का आकलन”? मेरी या ख़ुद की?

एक विकलांग व्यक्ति को ही क्यों जीवन के सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित करने के लिए जद्द-ओ-ज़हद करनी पड़ती है? क्या सिर्फ़ इसलिए कि उनकी विकलांगता दिखाई दे रही है?

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क्या मुसीबत है यार…

खुद पर खुद का बोझ ज़ब नहीं होता। आवाज़ सुनकर जवाब देना मुश्किल लगता है तो जीवन भर के सन्नाटों को जीने वालों से क्या कहेंगे? किसी आवाज़ को आवाज़ से जवाब दे सकना इतना भी मुश्किल नहीं होता।

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शर्त इतनी है…

विकृतियों पर हँसने वाले या उन पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले और विकृतियों को देख उन पर अपने ‘ओह्ह बेचारे’ रूपी तेज़ाब छिड़कने वाले इस समाज पर तरस नहीं हँसी आनी चाहिए

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हर समस्या अपने साथ समाधान लेकर आती है

उस वक़्त स्कूटी लाने के विचार से लेकर स्कूटी से अकेले बाहर जाने तक मैंने जिन-जिन समस्याओं का सामना किया उन समस्याओं के कुछ समाधान मेरे मन में बनते और बिगड़ते रहते थे। उन्हीं समाधानो में से एक समाधान के विचार को यहाँ साझा कर रही हूँ।

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सुविधाजनक-लीपापोती

सुविधाओं के नाम जितनी लीपापोती हमारे साथ की जा रही है शायद ही कहीं और होती हो। एक-दो जगहों को छोड़ कर बड़ी तस्वीर में देखें तो सुविधाओं के नाम पर बस लीपापोती ही मिलती है विकलांगजन को।

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मेरे मन ये बता दे तू किस ओर चला है तू?

जीवन में कुछ न कर पाने और असफल रह जाने की शंकाओं पर ध्यान केन्द्रित करने की बजाय अच्छा होगा कि हम अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित करें।