मेरी एक चीज़ ढूँढ कर ला दो प्लीज़…
आलोकिता अपने साप्ताहिक कॉलम में सुगम्यता के महत्त्व और हमारे सार्वजनिक स्थानों पर सुगम्यता की कमी को रेखांकित कर रही हैं।
आलोकिता अपने साप्ताहिक कॉलम में सुगम्यता के महत्त्व और हमारे सार्वजनिक स्थानों पर सुगम्यता की कमी को रेखांकित कर रही हैं।
यह एक अक्सर पूछा जाने वाला प्रश्न है कि क्या विकलांगजन विदेश जा सकते हैं? इस लेख में इस प्रश्न का विस्तार से उत्तर दिया गया है।
प्रदीप सिंह बता रहे हैं कि वास्तव में विकलांगता क्या है। प्रदीप कहते हैं कि “कहीं हम हमारे विकृत अंगों से उनके स्वीकृत लोक में खलबली न मचा दें। उनका यही डर इस विश्व में सबसे बड़ी विकलांगता है।”
आलोकिता बता रही हैं कि विकलांगजन को भी विवाह जैसे निजी मसले में अपना निर्णय स्वयं लेने की आज़ादी होनी चाहिये और अन्य लोगों को उनके निर्णय के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि नहीं रखनी चाहिये।
राही मनवा 04: लोगों द्वारा ख़ुद तय की गई अपनी संकीर्ण-सीमाओं के कारण ही हम एक प्यासे समाज में रह रहे हैं — यहाँ हर कोई किसी-न-किसी रूप में प्यासा है क्योंकि हम अपनी संकीर्ण सीमा से बाहर निकल कर रेगिस्तान में कुएँ खोदने कोशिश नहीं करते…
आलोकिता बता रही हैं कि चलना बेशक मानव जाति के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण क्रिया है लेकिन यह एक क्रिया आपकी पूरी ज़िन्दगी से बड़ी नहीं है। आगे बढ़ते रहना ज़रूरी है लेकिन चलना ही ज़िन्दगी नहीं है।
राही मनवा 04: कल फ़ेसबुक पर मित्र संजय कुमार वैद्य ने मुझसे पूछा कि मैं ‘दिव्यांग’ शब्द को लेकर क्या सोचता हूँ। मुझसे यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है और मैंने विभिन्न मंचों से अपना जवाब बताया भी है। आज सोचा कि संजय भाई के प्रश्न का उत्तर फ़ेसबुक पर न देकर ‘राही मनवा’ के ज़रिये दिया जाए ताकि यह बात अधिक लोगों तक पहुँचे।
आनुवांशिक विकारों से अपनी संतान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये संतान उत्पत्ति के बारे में सोचने से पहले स्त्री-पुरुष को अपनी जाँच करा लेनी चाहिये।
सम्यक ललित का विकलांगता विषयो पर नियमित कॉलम ‘राही मनवा’: 30 अप्रैल 2023 — बात मेरी पहली व्हीलचेयर की
विकलांगता विषयों पर सम्यक ललित का कॉलम ‘राही मनवा’: 23 अप्रैल 2023…